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सजल याद तेरी

तुम्हारी याद से सजल
दिल की मिटटी में,
दर्द अंकुर बन कर
उगने लगा है!
अब आ भी जाओ कि,
घर की दीवारों में
सीलन के जैसे
उदासी रमने लगी है!
धीरज बह गया है कहीं
उफनती भावनाओं की बाढ़  में,
ख़ुशी, एक कागज की कश्ती की तरह
पानी में गलने लगी है!
समय तो चल रहा है
अपनी गति से मगर
जिंदगी की रफ़्तार,
कही थमने लगी है1

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बात रिश्तों की

जो नहीं समझे कभी, बात रिश्तों की
वो ही क्यूँ करते हैं ,अक्सर बात रिश्तों की!
जो दिल के थे वो निभ गए, जो खून के थे निभा दिए,
दुनियादारी सी लगे , हर जात रिश्तों की!
फूल से खिलकर कभी, जज्बात को महका गए
कभी जनाजों सी लगी,बारात रिश्तों की!
इस हाथ दे, उस हाथ ले, फिर मैं कहाँ ओ तुम कहाँ
रह गयी है अब यही, औकात रिश्तों की!
फूल लेकर सबसे पहले, आये वो ही कब्र पर
जिनके हाथों से गिरी है, लाश रिश्तों की!
जख्म दिल पर और कुछ यादें, बहुत ही तल्ख़ सी
हम को तो ये ही मिली सौगात रिश्तों की!
जो नहीं समझे कभी भी बात रिश्तों की,
वो ही क्यूँ  करते है अक्सर बात रिश्तों की !!!!

फूल अमलतास के ….

झड रहे हैं..
फूल अमलतास के ….
गुच्छे दर गुच्छे,कतार दर कतार ..
पीली पीली किरणे..
सुबह के उजास से..
झड रहे हैं ,फूल अमलतास  के…
ठंडी, पीली, नर्म, मुलायम
चादर जैसे..बिछी हुई है..
सड़कों के किनारों पे
नंगे पावों को आमंत्रण सा देती…
जब प्रभात की हवा गुजरती पास से…
झड रहे है फूल अमलतास के..
अपने पीछे छोड़ देते ..
लम्बी, काली बदसूरत सी फलियाँ
जिनमे से फिर और उगेंगे,
वृक्ष अमलतास के.
फूलना, फलना, फिर बिखर जाना..
देने को जन्म नए जीवन को..
शायद यही  सिखाते हमको.
फूल अमलतास के…
झड रहे हैं, फूल अमलतास के!

छोटी छोटी बाते..

ये छोटी छोटी बाते..
ये बेमानी सी बातें..

ये जिद बच्चों के जैसी..
ये बचकानी सी बाते..
कब इतनी बड़ी हो जाती है…
कि शक कि छोटी सी दीमक ..
रिश्तों के दरख्त खा जाती है..
मुट्ठी में बंद रेत जैसे..
ख़ुशी फिसलती जाती है…
कुछ शेष नहीं रहता है जब..
केवल बाते रह जाती है.
.
ये छोटी छोटी सी बातें!
ये बेमानी सी बातें!

विवाह….. एक लड़की की नज़र से.

कहीं
किसी और की भाव भूमि में
बीज बन कर उगने के लिए…
अपनी धरती से स्वयं को ..
जड़ समेत उखाड़ लेना…
किसी के जीवन में ठहराव बन कर रहने के लिए….
अनवरत प्रवाह से, खुद को मोड़ लेना……
कठिन तो बहुत है लेकिन…
कुछ पाने के लिए………
कुछ तो खोना ही पड़ता है..
कुछ तो खोना ही पड़ता है!

वफ़ा

लोग सवाल उठाते है तेरी वफ़ा पे सनम
मुझको लोगों से सरोकार नहीं!
हाँ, तेरी वफ़ा पे मेरा इख़्तियार नहीं..
पर,तेरी वफ़ा की जरुरत भी नहीं है मुझको!
है मेरे दिल में मोहब्बत इतनी ..
है मेरी सीरत में इतनी वफ़ा….
कि दो जहाँ में इस रिश्ते को
निभाने के लिए काफी है!
तू मिले या न मिले, कोई फर्क नहीं..
तेरे ना मिलने का कोई दर्द भी नहीं!
मेरा इश्क अपनी जगह पे कायम है…
और इस इश्क में कोई भी शर्त नहीं!
और इस इश्क में कोई भी शर्त नहीं!!!

ताने बाने

मैं,शब्दों और अर्थों में उलझ उलझ
हर रोज नए ताने बाने बुनती हूँ.
नए पुराने रिश्तों से लिपट लिपट
फिर अपने लिए दर्द नए चुनती हूँ.
हटा कर धूल वक्त के आईने से
चेहरे की झुर्रियों को गिनती हूँ.
फिर उभर आता है पुराना जख्म कोई
कुछ नए जख्म रोज सिलती हूँ.
मैं कहाँ गलत हूँ,कहाँ सही?
यही सवाल लिए अपने आप से मिलती हूँ.
कभी तो रौशनी की कद्र होगी ”शमा”
इसी उम्मीद में हरेक रात जलती हूँ.
मैं शब्दों और अर्थों में उलझ उलझ
हर रोज नए ताने बाने बुनती हूँ……….
हर रोज नए ताने बाने बुनती हूँ……………..

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