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माँ

माँ की आँखों का क्या है..
वो तो यूँ ही नम हो जाती है !
जब आँचल में पहली बार.
जीवन की नयी किरण मुस्काई थी ..
तब भी तो माँ की आँखे ,
ऐसे ही भर आई थी..
वो पहला तुतलाया शब्द,
पहला डगमग कदम ..
वो गिर कर, जब जब तूने ..
चोट कोई भी खायी थी.
तब भी तो माँ की ऑंखें ऐसे ही भर आई थी!
बचपन में जब तुझको तेरा
मनचाहा न दे पाती थी.
या अब किस्मत और मेह्नत से तुमको
मनचाहा न मिल पता है..
तब तुम को समझाती थी…
अब खुद को समझाती है….
माँ की आँखों का क्या है,
ये तो यूँ ही भर आती है!

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सावन

सावन तो फिर से आया है..
पर सावन में वो बात नहीं!
वो झूलों वाले बाग़ नहीं..
वो मेहंदी वाले हाथ नहीं!

झूलों पे बैठ के गाते थे..
जब ऊँची पींग बढ़ाते थे..
जो दिल में हूक उठाते थे..
वो सखियों वाले राग नहीं!

कुंदन हलवाई का घेवर..
भैया को भेज मंगाती थी..
मठरी, गुझिया जाने क्या क्या..
जिद करके बनवाती थी…
बड़े जतन से बांध पोटली..
अम्मा जो भिजवाती थी..
बाबुल के लाड भरी गठरी..
वो”तीजो” की सौगात नहीं!

सब दूर दूर बिखरे छितरे ..
अपने अपने में व्यस्त सभी..
अबकी राखी पे आ जाना..
वो भैया की मनुहार कहाँ?
मीठे तीखे की कौन कहे..
रिश्तों में भी वो स्वाद नहीं…

सावन तो फिर से आया है..
पर सावन में वो बात नहीं..
पर सावन में वो बात नहीं!

लफ्ज़

तुम्हारे लिए..
ख्यालों में…
लफ़्ज़ों की एक कायनात,
सजाते है ..
हर रोज.
शायरों से रोमानी बाते..
औलिओं से रूहानी बाते..
आशिकों से जज्बाती बाते..
किताबों से ढूंड ढूंड कर..
करते है जेहन में जमाँ..
फिर भी..
तुम्हारे रूबरू होते ही..
खुल जाते है जैसे कई पिंजरे से..
सारे लफ्ज़ ..
पंछियों की तरह उड़ जाते है..
तुम…
एक ऐसा अहसास हो मेरे लिए..
जिसके लिए..
दुनिया के सारे लफ्ज़
कम पड़ जाते है!

 

गीत

कुछ गीत
मै बहुत पीछे छोड़ आई हूँ.
कुछ गीत…
उजालों के..
अंधेरों के..
जाग कर काटी हुई..
रातो के अलस सवेरों के…

कुछ गीत
स्मृतियों के..
कभी नम हुई आँखों के..
कभी स्वप्नों की पाँखों के ..
कुछ गीत
विश्वास के..
कुछ नि:स्वास के ….

कुछ गीत
अपनों के..
सपनो के…
प्यार के..
अभिसार के..
एक अनजानी सी टीस के..
एक अजनबी अहसास के…

कुछ गीत ..
मैं बहुत पीछे छोड़ आई हूँ ….
वो गीत जिन्हें कभी..
होठों से गुनगुनाया नहीं…
भूले से भी, कभी…
किसी को सुनाया नहीं…
वो गीत..
पुरानी डायरी के पन्नो में…
अब भी…
कसमसाते है…
पिंजरे में कैद पंछी से…
पंख फड फडाते हैं…
वो गीत अब भी…
बहुत याद आते है…
बहुत याद आते है…

कुछ गीत मैं ..
बहुत पीछे छोड़ आई हूँ…
बहुत पीछे छोड़ आई हूँ…

 

शिक्षा

मेरी बेटी है.
परी सी है..
बहुत प्यारी सी है..
सलोनी है.
उम्र की उस दहलीज
पर पाँव रख रही है.
जब लोग मुझसे पूछते है..
आपने अपनी बिटिया को क्या क्या सिखाया है?
मेरा जवाब भी हाज़िर है… मैंने अपनी बेटी को ..
‘ना’ कहना सिखाया है!
ना कहना सिखाया है..
हर घूरती हुई नजर को..
जो उसे डराना चाहती है..
ना कहना सिखाया है.
हर उस हाथ की हरकत को…
जो कभी बस में, कभी सड़क पे
जबरदस्ती उसे छूना चाहती है!
ना कहना सिखाया है..
हर उस त्याग को..
जो उसे सिर्फ लड़की होने के कारण
करना पड़े!
ना कहना सिखाया है..
हर उस सोच को..
जो उसे किसी पुरुष से काम समझती है!
मैंने उसे..
हर मुसीबत की आँखों में ..
आंखे डाल कर..
डट कर खड़े रहना सिखाया है!
मुझे गर्व है..
अपनी बेटी पर..
और अपनी शिक्षा पर!

एक सवाल

मैं तेरी जीत का जश्न मनाऊं
या अपनी हार पे मैं रो लूं जार जार?
तू आदम है, मैं ईवा तेरी..
फिर तेरे मेरे बीच ये कशमकश क्यूँ है?
मैं सिर्फ “एक” तुझ से ही मुक्कमल हूँ
तू सिर्फ “एक” मुझ से ही मुक्कमल है…
फिर तेरे दिल में”और और”की
हवस क्यूँ है बार बार??
मैं तेरी जीत का जश मनाऊं?
या अपनी हार पे मैं रो लूं जार जार?????

समर्पण

मन, प्राण, श्वाश, धड़कन
तुम मेरे क्या हो?

पतझड़ से जीवन में आकर
तुमने शतदल कमल खिलाया
तुम बहार बन कर आये हो—
मेरे फागुन और बसंत हो!

सार्थक मुस्कानों में बदला तुमने
मेरे निर्थक से दुःख को
तुम नयी दिशा इस जीवन की—
मेरे मार्ग और लक्ष्य हो!

तुम नवल आस मेरे जीवन की
श्वाशों का नवीन बंधन हो
तुम मेरे सपने, मेरे अपने—
मेरी पूजा और पूज्य हो!

तुम मेरे सुख की सीमा हो,
और मेरा उन्मुक्त गगन हो
तुम आशान्वित दृष्टिकोण हो–
मेरी दृष्टि और दृश्य हो!

पल-पल मेरी स्मृति में तुम हो
सोचूं तुम मेरे क्या कुछ हो?
कल्पना से अनुभूति तक—
तुम मेरे सब कुछ हो,
प्रिय! तुम मेरे सब कुछ हो!

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